'छिछोरे' फिल्म रिव्यू- दोस्ती के मजेदार किस्सों के बीच, एक दमदार मैसेज देती है फिल्म


फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

लूजर शब्द का सही मतलब समझाने के लिए अनिरुध अपने बेटे को अपनी कॉलेज लाइफ के किस्से सुनाता है। इन किस्सों में ही असली मज़ा है। यहां एक के बाद एक सभी किरदार सामने आते जाते हैं अनिरुध बन जाता है अन्नी और उसके साथी हैं सेक्सा, एसिड, मम्मी, डेरेक, बेवड़ा और माया। भारत के नंबर 1 इजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में पढ़ रहे इन सातों की कॉलेज लाइफ आपको समय समय पर गुदगुदाती है। आपसी रिश्ते, दोस्ती, प्रतिस्पर्धा, जुनून और सकारात्मकता के साथ कहानी आगे बढ़ती है। शायद हर दर्शक इन कहानियों से अपनी कॉलेज की कहानियों को जोड़ पाएंगे।

फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

नहीं, फिल्म 3 इडियट्स की तरह ‘काबिल बनो, सफलता झक मार कर पीछे आएगी’ जैसा ज्ञान नहीं देती है। बल्कि हंसते हंसाते इस बात का अहसास दिलाती है कि हर बार जीतना जरूरी नहीं होता। फिल्म की एक सीन में अन्नी कहता है- सफलता मिलने के बाद का प्लान सभी सोचते हैं, लेकिन फेल होने के बाद क्या करना है ये कोई नहीं बताता।

अभिनय

अभिनय

अभिनय की बात करें तो फिल्म में हर कलाकार को उम्र के दो पड़ाव में दिखाया गया है। यूं तो फिल्म का रियल हीरो, फिल्म की कहानी है.. लेकिन सुशांत सिंह राजपूत, श्रद्धा कपूर, वरुण शर्मा, तुषार पांडे, नवीन पॉलिशेट्टी, ताहिर भसीन, सहर्ष कुमार और प्रतीक बब्बर ने अपने किरदारों को पूरी सच्चाई के साथ निभाया है। कॉमेडी सीन से लेकर गंभीर संवेदनशील संवाद तक, निर्देशक ने सभी किरदारों को खुलकर अभिनय करने का मौका दिया है। कुछ सीन वाकई ठहाके मारकर हंसने को मजबूर करते हैं। लेकिन संवेदनशील दृश्यों में अभिनय थोड़ी कमजोर दिखी है, खासकर किरदारों के उम्रदराज़ पड़ाव में। बूढ़े लुक में सुशांत कुछ सीन में असहज लगे हैं। हालांकि कहानी के साथ बंधे होने की वजह से ये कमियां आपका ध्यान आकर्षित नहीं करती।

निर्देशन

निर्देशन

कॉलेज लाइफ पर बनी दूसरी फिल्मों से तुलना की बात की जाए तो यह जो जीता वही सिकंदर, स्टूडेंट ऑफ दि ईयर और 3 इडियट्स के आसपास आती है। लेकिन नितेश तिवारी का ट्रीटमेंट इसे बाकी फिल्मों से बिल्कुल अलग करता है। दंगल से हम निर्देशक का कौशल आंक चुके हैं, जिसकी झलक ‘छिछोरे’ में भी दिखती है। फिल्म की पटकथा भी नितेश तिवारी द्वारा ही लिखी है। लिहाजा, कॉमेडी के साथ ड्रामा का सही संतुलन है। लगभग ढ़ाई घंटे की यह फिल्म बोझिल नहीं होती है। बीते हुए कल में जहां रोमांस है, दोस्ती है और चैंपियनशिप है.. वहीं, वर्तमान में एक स्थिरता है, समय और दूरी के साथ एक समझौता है। कहानी का पूर्वानुमान आप लगा सकते हैं कि इसे निर्देशन का ही कमाल कहेंगे कि क्लाईमैक्स तक फिल्म बांधे रखती है। प्रीतम द्वारा दिया गया संगीत ज्यादा असर नहीं छोड़ता। वहीं, सितारों के लुक्स पर थोड़ा और काम किया जा सकता था। चारु श्री रॉय की एडिटिंग एक मजबूत पक्ष है।

कुल मिलाकर, नितेश तिवारी की फिल्म ‘छिछोरे’ हॉस्टल के गलियारों से होते हुए आपके दिलोदिमाग पर हावी होने की क्षमता रखती है। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म से 3.5 स्टार।



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