होटल मुंबई फिल्म रिव्यू – 26/11 आतंकी हमले में 'ताज' की कहानी, आंखें नम कर देगी


फिल्म की कहानी

फिल्म की कहानी

साल 2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले का खौफनाक मंजर पूरी दुनिया ने देखा था। मुंबई के सीएसटी स्टेशन, कैफे leopold, कोलाबा में मौत का तांडव फैलाते हुए आतंकियों ने होटल ताज को निशाना बनाया था। आज भी ताज से निकलती आग की लपटें हमारे ज़ेहन में ताज़ा है। निर्देशक ने इस फिल्म का केंद्र होटल ताज को ही रखा है। हर दिन की तरह 26 नवंबर के दिन की भी शुरुआत होती है। होटल के स्टॉफ ‘गेस्ट इज गॉड’ सोच के साथ सबका स्वागत कर रहे हैं। वीआईपी गेस्ट डेविड डंकन (आर्मी हेमर) उनकी वाइफ जारा (नाजनीन बोनिडी), रशियन बिजनेसमैन वासिली गोर्दस्की (जेसन आईसेक) का आवभगत किया जा रहा है। होटल के चीफ शेफ हेमंत ओबेरॉय (अनुपम खेर) हर स्टॉफ को उत्कृष्ट मेहमाननवाजी का निर्देश दे रहे हैं। वेटर अर्जुन (देव पटेल) समेत सभी अपने कामों में व्यस्त हैं। लेकिन इन्हें ये अंदाज़ा नहीं है कि मुंबई के कई हिस्सों में आंतकवादी हमला बोल चुके हैं। और जब तक इन्हें इस बात की जानकारी लगती है, देर हो चुकी है। आतंकी होटल के अंदर हैं और अंधाधुन गोलियां बरसा रहे हैं। ऐसे में होटल के स्टॉफ किस तरह अपनी जान की परवाह ना करते हुए गेस्ट की सुरक्षा का जिम्मा लेते हैं और वहां से जिंदा बाहर निकलने की युक्ति बनाते हैं, इसी पर आधारित है ‘होटल मुंबई’।

निर्देशन

निर्देशन

ऑस्ट्रेलियन फिल्ममेकर एंथोनी मारस की यह डेब्यू फिल्म है। कहना गलत नहीं होगा कि उनका निर्देशन काफी सधा हुआ है। इस हमले पर पहले भी फिल्में और डॉक्यूमेंट्री बन चुकी हैं। लेकिन निर्देशक ने यहां एक अलग कोण दिखाया है। यह होटल ताज में फंसे लोगों की जान बचाने वाले स्टॉफ के साहस, दृढ़ता और फैसलों की कहानी है। वहां फंसे लोगों को कैसी परिस्थितियों से गुजरना पड़ा, उनका इंतजार, गुस्सा, डर, फिक्र, उम्मीद, लाचारी .. सभी बातों को निर्देशक से संवेदनशीलता के साथ दिखाया है। कहानी भले ही हमले पर आधारित है, लेकिन यहां किरदारों के आपसी संबंधों को केंद्रित किया गया है। हर किरदार को इतनी सलीके से बुना गया है कि आप शुरु से अंत तक उनसे जुड़े रहते हैं। उनके साथ साथ डरते हैं, उनकी फिक्र करते हैं, उनके साथ सोचते हैं। इसे एक निर्देशक की जीत कहेंगे।

अभिनय

अभिनय

खास बात यह है कि फिल्म में किसी एक किरदार को मुख्य किरदार नहीं कहा जा सकता। यहां सभी किरदार हीरो हैं। देव पटेल, अनुपम खेर, आर्मी हेमर, नाजनीन बोनिडी, जेसन आईसेक ने फिल्म को एक नयापन दिया है। वो अनदेखे से लगते हैं, शायद इसीलिए आप उनसे जुड़ जाते हैं। सभी कलाकारों ने अपने किरदारों को काफी सच्चाई के साथ और संयमित होकर निभाया है। व्यकितगत क्षणों में उनके हाव भाव और हमले के बाद उनमें आया बदलाव फिल्म में साफ दिखता है।

तकनीकि पक्ष

तकनीकि पक्ष

निर्देशन से लेकर एडिटिंग, सिनेमेटोग्राफी, साउंड मिक्सिंग, डायलॉग्स सभी विभागों में अच्छा काम किया गया है। इतनी बड़ी घटना को महज दो घंटे में पिरोना आसान नहीं है। Nick Remy Matthews की सिनेमेटोग्राफी कहानी को एक वास्तविकता का चेहरा देती है। वहीं, एडिटिंग की भी तारीफ होनी चाहिए जो आपको एक अनिश्चितता में बांधकर रखता है। फिल्म में आगे क्या होने वाला है, इसकी उत्सुकता इसे सफल बनाती है।

देंखे या ना देंखे

देंखे या ना देंखे

फिल्म ऑस्ट्रेलियन फिल्ममेकर द्वारा मुख्य तौर पर अंग्रेजी में ही बनाया गया है। लिहाजा, हिंदी डबिंग होते हुए भी कई सीन में किरदार अंग्रेजी में बात करते दिखेंगे। लेकिन फिल्म इमोशनल स्तर पर आपको इस तरह जोड़ लेती है कि कुछ बातों को नजरअंदाज़ किया जा सकता है। 26/11 के आतंकी हमले पर बनी एक अच्छी फिल्म बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं कि तो ‘होटल मुंबई’ जरूर देंखे। फिल्मीबीट की ओर से फिल्म को 3.5 स्टार।



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